आज के समय में जब धर्म और आस्था को अक्सर केवल बाहरी कर्मकांड तक सीमित कर दिया गया है, ऐसे में संत प्रेमानंद महाराज का एक स्पष्ट और कठोर संदेश लोगों का ध्यान खींच रहा है। उन्होंने कहा कि यदि व्यक्ति मंदिर तो जाता है, लेकिन उसके विचार और व्यवहार अशुद्ध हैं, तो केवल पूजा-पाठ से जीवन का कल्याण संभव नहीं है।
प्रेमानंद महाराज के अनुसार, धर्म का वास्तविक उद्देश्य मन, वाणी और कर्म — तीनों की शुद्धता है।
केवल मंदिर जाना पर्याप्त नहीं
प्रेमानंद महाराज ने अपने प्रवचन में कहा कि आज कई लोग नियमित रूप से मंदिर जाते हैं, लेकिन बाहर निकलते ही
- गंदी बातें करते हैं
- दूसरों की निंदा करते हैं
- वाणी और विचार में संयम नहीं रखते
ऐसे में केवल मंदिर जाना एक औपचारिकता बनकर रह जाता है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि मन अशुद्ध है, तो मंदिर जाना भी व्यक्ति को सही दिशा नहीं दे सकता।
विचारों की शुद्धता सबसे महत्वपूर्ण
महाराज ने बताया कि ईश्वर बाहरी दिखावे से नहीं, भीतर की भावना से प्रसन्न होते हैं।
यदि व्यक्ति के विचार गलत हैं, अहंकार और नकारात्मकता से भरे हैं, तो पूजा-पाठ का वास्तविक फल नहीं मिलता।
उनका कहना था कि
धर्म केवल शरीर से नहीं,
मन से किया जाता है।
नाम जप और आचरण पर ज़ोर
प्रेमानंद महाराज ने कहा कि सच्ची भक्ति का मार्ग
- नाम जप
- संयमित वाणी
- और सदाचार
से होकर गुजरता है। केवल मंदिर जाकर घंटी बजा देना या दीप जला देना पर्याप्त नहीं है, जब तक व्यक्ति अपने व्यवहार में सुधार न लाए।
उन्होंने यह भी कहा कि यदि व्यक्ति मंदिर जाकर भी गलत आचरण करता है, तो वह स्वयं को धोखा दे रहा है, ईश्वर को नहीं।
धर्म का अर्थ आत्मसुधार है
महाराज के अनुसार धर्म का मूल उद्देश्य आत्मसुधार है, न कि दूसरों को दिखाने का माध्यम।
जो व्यक्ति मंदिर में शांति खोजता है, उसे सबसे पहले अपने भीतर शांति लानी होगी।
उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि यदि कोई व्यक्ति मंदिर जाकर भी नकारात्मक विचारों और गलत कर्मों में लिप्त रहता है, तो वह अपने जीवन का सही मार्ग स्वयं ही खो देता है।
समाज के लिए संदेश
प्रेमानंद महाराज का यह संदेश आज के समाज के लिए विशेष रूप से प्रासंगिक है। यह हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हमारी भक्ति केवल आदत बनकर रह गई है, या हम वास्तव में अपने जीवन में धर्म के मूल्यों को अपना रहे हैं।
सच्चा धार्मिक जीवन वही है, जहाँ
- विचार शुद्ध हों
- वाणी संयमित हो
- और कर्म कल्याणकारी हों
निष्कर्ष
प्रेमानंद महाराज का संदेश सीधा और स्पष्ट है —
मंदिर जाना आवश्यक है, लेकिन उससे भी अधिक आवश्यक है मन की शुद्धता।
यदि भक्ति को जीवन में उतार लिया जाए, तो मंदिर केवल एक स्थान नहीं रहता, बल्कि पूरा जीवन ही साधना बन जाता है।
